Panchayat Season 4 Review Hindi: मैं अभी फुलेरा गांव में हूँ। सच कहूं तो यहां की हकीकत, ‘पंचायत’ सीरीज के नए सीजन से कई गुना ज्यादा जानदार है! बिजली यहां लुका-छिपी खेलती है – दिन भर लट्टू, रात को कभी खुद आ जाए। प्रधान जी और ब्लॉक वाले आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं – कल की शुरू की योजना आज ही ठंडे बस्ते में। मनरेगा का सारा काम ठेकेदारों के भरोसे। स्कूल के टीचर साहब अभी से घबराए हुए हैं कि जनगणना में उनका नंबर कब आएगा और कितना काम पड़ेगा। गांव में स्कूल और पंचायतें मिलाने का झमेला भी चल रहा है।
हर आदमी अपनी धुन में मस्त। सियासत तो हर नुक्कड़ पर है – हलवाई की दुकान से लेकर मंदिर के चबूतरे तक। पर इस बार फुलेरा में न कोई प्रधान जी की चाबी गायब हुई है, न किसी बूढ़े पेड़ के नीचे कोई जगमगाता चेहरा नजर आता है। ‘पंचायत सीजन 4’ जैसा बनने की कोशिश यहां नहीं है। यही साबित करता है कि जो कहानी चल पड़े, उसे बेवजह चबा-चबा कर खींचते नहीं रहना चाहिए।
Panchayat Season 3 के सवालों के जवाब मिले?
अरे भाई! ‘पंचायत’ के पिछले सीजन के वो अनसुलझे सवाल याद हैं? जैसे – गोली चलाई किसने? विधायक साहब और उनका घोड़ा? हाँ! मनोज तिवारी का धमाकेदार गाना? और वो जो सचिव जी और प्रधान की बेटी का प्रेम प्रसंग गरमाया हुआ था? वो भी याद है न! अब बताइए, चौथा सीजन देखने से पहले हर दर्शकों ने इन बातों को याद करके ‘रिवाइंड’ तो किया ही होगा।
पर अफ़सोस! Panchayat Season 4 इन रास्तों से गुज़रता ही नहीं! उसे तो बिलकुल अलग ही घाट की पगडंडी पर ले जाया गया है। नाम तो फुलेरा है मगर असली बातें गायब हैं। कभी बरसात में फूले दरवाजे को बंद करने की कोशिश की है? जैसे उसमें जान लगानी पड़ती है, ठीक वैसा ही जोर-जबरदस्ती इस सीजन को बनाने में भी दिखी है।
कलाकार तो बेहतरीन, पर कहानी ही गायब!
अरे भई! ‘पंचायत’ के चौथे सीजन को देखकर तो मन में शक पैदा होता है। भला कोई ऐसी धाँसू सीरीज का ट्रेलर रिलीज़ होने के सिर्फ सात दिन बाद पूरा सीजन क्यों छोड़ता है? इतने जबरदस्त कलाकार – जितेंद्र, नीना जी, रघुवीर भाई सब – सबको जोड़ने के बाद भी अगर दिल न जीते, तो गम होता है ना? ये तो वक्त की बरबादी भी है और सीरीज की इज्ज़त पर भी दाग लगा है।
इस बार तो पूरी कहानी फुलेरा की पंचायत चुनाव में फँसी रह गई है, जहाँ मंजू देवी और क्रांति देवी आँखें दिखा रही हैं। असल मुकाबला तो उनके मर्दों के बीच चल रहा है, जो एक-दूसरे को उखाड़ फेंकने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। अगर आपको लोगों की कलई खोलने में मजा आता है, तो शुरू-शुरू में ये चल जाएगी। मगर धीरे-धीरे लगेगा कि जैसे रोटी को बिना सब्ज़ी के चबा रहे हैं – बस जबरन खींचा जा रहा है।
खो गई चौकड़ी की जान, चार दोस्तों का जादू कहाँ गुम हुआ?
सीरीज की सबसे बड़ी कमी? वो चार यार – सचिवजी, विकास, प्रह्लाद चा और प्रधानजी – अब पहले जैसे नहीं रहे! इनकी जुगलबंदी तो ‘पंचायत’ की जान थी, पर अब ये रिश्ते बनावटी लगते हैं। न तो इनमें वो पुरानी गर्मजोशी बची है, न हँसी-मजाक की वो मस्ती। प्रह्लाद और विकास के जोड़ में भी अब वो दिलचस्पी नहीं रही – सब कुछ ठंडा-ठंडा सा लगता है।
किरदारों की सादगी गायब है, प्रधानजी के मजेदार बोल अब नहीं सुनाई देते, और न ही वो दिल छू लेने वाली झड़पें ही दिखती हैं। नीना गुप्ता और सुनीता राजवार के बीच टकराव होने के बावजूद, दोनों पूरे सीजन एक-दूसरे से टकराने से कतराते नजर आते हैं।
सीजन 4: एक्टर्स ने बचाई इज्ज़त, लेखकों ने गिराया स्तर!
सीजन 4 की सबसे बड़ी ताकत? रघुवीर यादव और नीना गुप्ता की धमाकेदार परफॉर्मेंस! इन दोनों ने पूरा सीजन अपने कंधों पर ढोया। दुर्गेश कुमार भी इस बार हीरो जितेंद्र कुमार से आगे नजर आए। बाकी कलाकारों ने बस औपचारिकता निभाई। सान्विका की मासूमियत अब भी दिल जीतती है, पर लगता है कॉन्ट्रैक्ट की बेड़ियों ने उन्हें दूसरे प्रोजेक्ट्स से रोक रखा है।
सबसे दुखद? सीरीज की रफ़्तार लगातार सुस्त पड़ती गई। सीजन 3 में ही गिरावट शुरू हुई थी, और उम्मीद थी कि टीम इसे सुधारेगी। मगर जब OTT प्लेटफॉर्म ने सीजन 5 पहले ही हरी झंडी दिखा दी, तो सीजन 4 को दर्शकों की परवाह किसे होती?